Durga Chalisa
A devotional hymn composed for regular chanting, bringing devotion, clarity, and spiritual strength.
ॐ नमः शिवाय | जय श्री राम | जय हनुमान
Durga Chalisa (हिंदी)
दोहा
नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो अंबे दुःख हरनी
नमो नमो अंबे दुःख हरनी
नमो नमो दुर्गे, सुख देने वाली। नमो नमो अंबे, दुःख नाश करने वाली। तुम्हारी ज्योति निराकार है, तीनों लोकों में प्रकाश फैला हुआ है।
चौपाई
शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ १
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ १
चंद्रमा जैसे ललाट, विशाल मुख। लाल नेत्र और भयंकर भौंहें।
रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दर्श करत जन अति सुख पावे ॥ २
दर्श करत जन अति सुख पावे ॥ २
माता का रूप अति सुंदर। दर्शन करने से भक्तों को अत्यंत सुख मिलता है।
तुम संसार शक्ति लय कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ ३
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ ३
संसार की सृजन-संहार शक्ति तुम हो। पालन हेतु अन्न-धान्य दिया।
अन्नपूर्णा हुयी जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ ४
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ ४
अन्नपूर्णा बनकर जग को पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बालरूप हो।
प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ ५
तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥ ५
प्रलयकाल में सबका नाश किया। तुम गौरी हो, शिव-शंकर की प्रिय।
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ६
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ६
शिव और योगी तुम्हारे गुण गाते। ब्रह्मा-विष्णु निरंतर तुम्हारा ध्यान करते।
रूप सरस्वती का तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ ७
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ ७
सरस्वती रूप तुम धारण करती। ऋषि-मुनियों को बुद्धि देकर उबारा।
धरा रूप नरसिंह को अंबा ।
प्रगट भईं फाड़ के खंबा ॥ ८
प्रगट भईं फाड़ के खंबा ॥ ८
धरारूप में नरसिंह बनी। खंभ फाड़कर प्रकट हुई।
रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ ९
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ ९
प्रह्लाद की रक्षा कर बचाया। हिरण्याक्ष को स्वर्ग भेजा।
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १०
श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १०
लक्ष्मी रूप धारण कर जग में आई। नारायण के अंग में समाई।
क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ ११
दयासिंधु दीजै मन आसा ॥ ११
क्षीरसागर में विलास करती। दयासागर मन की आशा पूरी करती।
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥ १२
महिमा अमित न जात बखानी ॥ १२
हिंगलाज में तुम ही भवानी। महिमा अनंत, वर्णन नहीं हो सकता।
मातंगी धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ १३
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥ १३
मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी, बगला - सब सुख देने वाली।
श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १४
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १४
भैरवी तारा जग की तारिणी। छिन्नमस्ता भवदुःख निवारिणी।
कहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ १५
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ १५
सिंह वाहन शोभित भवानी। लंगूर वीर आगे चलते।
कर में खप्पर खड्ग विराजे ।
जाको देख काल डर भाजे ॥ १६
जाको देख काल डर भाजे ॥ १६
हाथ में खप्पर-खड्ग शोभित। जिसे देखकर काल भी भयभीत।
तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ १७
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ १७
त्रिशूल धारण करती। शत्रु के हृदय में शूल पैदा होता।
नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ १८
तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥ १८
नगर कोटि में विराजमान। तीनों लोकों में डंका बजता।
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥ १९
रक्तबीज शंखन संहारे ॥ १९
शुंभ-निशुंभ को मारा। रक्तबीज सहित संहारा।
महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ २०
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ २०
महिषासुर राजा बहुत अभिमानी। पाप भार से पृथ्वी व्याकुल।
रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ २१
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ २१
भयंकर कालिका रूप धारण। सेना सहित उसका संहार किया।
परी भीड़ संतन पर जब जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २२
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २२
संतान पर संकट पड़े तब तब। सहाय बनी माता तब तब।
अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब कहें अशोका ॥ २३
तब महिमा सब कहें अशोका ॥ २३
स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में। तुम्हारी महिमा सभी कहते।
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ २४
तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥ २४
ज्वाला में तुम्हारी ज्योति। नर-नारी सदा पूजते।
प्रेम भक्ति से जो यश गावैं ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवैं ॥ २५
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवैं ॥ २५
प्रेम भक्ति से जो यश गाए। दुःख-दरिद्र नजदीक न आए।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।
जन्म मरण ते सौं छूटि जायि ॥ २६
जन्म मरण ते सौं छूटि जायि ॥ २६
मन लगाकर जो तुम्हें ध्यावे। जन्म-मरण से छूट जाता।
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न होई बिन शक्ति तुम्हारी ॥ २७
योग न होई बिन शक्ति तुम्हारी ॥ २७
योगी, देव, मुनि चिल्लाते। तुम्हारी शक्ति बिना योग नहीं।
शंकर आचार्य तप कीनो ।
काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ २८
काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ २८
शंकराचार्य ने तप किया। काम-क्रोध जित सब लीन किया।
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ २९
काहू काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ २९
दिन-रात शंकर का ध्यान। कभी तुम्हें न सुमिरो।
शक्ति रूप को मरम न पायो ।
शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥ ३०
शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥ ३०
शक्ति रहस्य न समझा। शक्ति गई तो मन पछताया।
शरणागत हुए कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदंब भवानी ॥ ३१
जय जय जय जगदंब भवानी ॥ ३१
शरणागत हो कीर्ति गाई। जय जय जगदंब भवानी।
भई प्रसन्न आदि जगदंबा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥ ३२
दई शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥ ३२
प्रसन्न हुई आदि जगदंबा। शक्ति दी बिना विलंब।
मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ ३३
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ ३३
मां कष्ट घेरे। तुम्हें छोड़ कौन हराए।
आशा तृष्णा निपट सतावे ।
रिपु मूर्ख मोहि अति दर्प पावे ॥ ३४
रिपु मूर्ख मोहि अति दर्प पावे ॥ ३४
आशा-तृष्णा सताती। शत्रु-मूर्ख अहंकार पालते।
शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ ३५
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ ३५
महारानी शत्रु नाश करो। भवानी तुम्हें सुमिरते।
करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥ ३६
ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥ ३६
दयामयी माता कृपा करो। ऋद्धि-सिद्धि दो।
जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥ ३७
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥ ३७
जीते रहूं दया फल पाऊं। तुम्हारा यश सदा गाऊं।
दुर्गा चालीसा जो गावै ।
सब सुख भोग परम पद पावै ॥ ३८
सब सुख भोग परम पद पावै ॥ ३८
दुर्गा चालीसा जो गावे। सब सुख भोग परम पद पावे।
देवीदास शरण निज जानी ।
करहु कृपा जगदंब भवानी ॥ ३९
करहु कृपा जगदंब भवानी ॥ ३९
देवीदास अपनी शरण जानकर। जगदंबा कृपा करो।
दुर्गा चालीसा जो गावै । सब सुख भोग परम पद पावै
दुर्गा चालीसा का पाठ करने वाले को सब सुख और परम पद प्राप्त होता है। देवीदास अपनी शरण में जानकर जगदंबा कृपा करें।