Shiva Chalisa
A devotional hymn composed for regular chanting, bringing devotion, clarity, and spiritual strength.
ॐ नमः शिवाय | जय श्री राम | जय हनुमान
Shiva Chalisa (हिंदी)
दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
गणेश जी की जय, आप ही मंगल के मूल हैं। अयोध्यादास कहते हैं, हमें अभय वरदान दें।
चौपाई
जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ १
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ १
गिरिजा पति की जय, दीनों पर दया करने वाले। सदा संतानों की रक्षा करते हैं।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥ २
कानन कुण्डल नागफनी के ॥ २
भाल पर चन्द्रमा सुन्दर लगता है। कानों में नागफणि के कुण्डल।
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ ३
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ ३
गौर वर्ण, शिर पर गंगा बहती है। मुण्डमाला पहने, तन पर भस्म लगाए।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ ४
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ ४
बाघम्बर सुशोभित। नाग भी आपकी छवि देख मोहित।
मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ ५
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ ५
मैना माता की दुलारी (पार्वती) बाएं अंग पर शोभित।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ ६
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ ६
त्रिशूल धारण कर शत्रुओं का नाश करते हैं।
नन्दि गणेश सोहै तहाँ कैसे।
सागर मध्य कमल है जैसे ॥ ७
सागर मध्य कमल है जैसे ॥ ७
नंदी-गणेश समुद्र में कमल के समान शोभित।
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
यह छवि को कही जात न काऊ ॥ ८
यह छवि को कही जात न काऊ ॥ ८
कार्तिक, श्याम, गणराज - आपकी छवि वर्णन से परे।
देवन जबही जाने पुकारा।
तबही दुख प्रभु आप निवारा ॥ ९
तबही दुख प्रभु आप निवारा ॥ ९
देवता पुकारते ही आप दुख हर लेते हैं।
कीया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिल तुम्हिन जूहारी ॥ १०
देवन सब मिल तुम्हिन जूहारी ॥ १०
तारक के उपद्रव से देवता आपकी शरण आए।
तुरंत षडानन आप पठायौ।
लवणिमेष महँ मारी गिरायौ ॥ ११
लवणिमेष महँ मारी गिरायौ ॥ ११
षडानन को भेजा, तुरंत मार गिराया।
आप जलधर असुर संहारा।
सुँयश तुम्हार विदित संसारा ॥ १२
सुँयश तुम्हार विदित संसारा ॥ १२
जलधर असुर का संहार किया, सारा संसार जानता।
त्रिपुरासुर सं युद्ध मचायी।
सबहि कृपा कर लीन बचायी ॥ १३
सबहि कृपा कर लीन बचायी ॥ १३
त्रिपुरासुर युद्ध में सभी को कृपा से बचाया।
कीया तपहिं भगीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ १४
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ १४
भगीरथ के तप से गंगा लाए, प्रतिज्ञा निभाई।
दानिन महि तुम सम कोई नahi।
सेवक स्तुति करत सदा ही ॥ १५
सेवक स्तुति करत सदा ही ॥ १५
दानियों में आप जैसा कोई नहीं, हम सदा स्तुति करते।
वेदनहि महिमा तुम गाए।
अकथ अनादि भेद नहि पाए ॥ १६
अकथ अनादि भेद नहि पाए ॥ १६
वेदों में भी आपकी महिमा निहित, रहस्य अपरम्पार।
प्रकटी उधधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भये विह्वला ॥ १७
जरत सुरासुर भये विह्वला ॥ १७
समुद्र मंथन में ज्वाला प्रकट हुई, देवासुर व्याकुल।
कीन्ही दया तहाँ करी सहाई।
नीलकंठ तब नाम कहाई ॥ १८
नीलकंठ तब नाम कहाई ॥ १८
दया कर सहायता की, नीलकंठ नाम पाया।
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ १९
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ १९
राम ने पूजा, लंक विजय के बाद विभीषण को दिया।
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ही परीक्षा तब्हि पुरारी ॥ २०
कीन्ही परीक्षा तब्हि पुरारी ॥ २०
सहस कमल पूजा में परीक्षा ली।
एक कमल प्रभु राखे जो।
कमल नयन पूजन चहें सोई ॥ २१
कमल नयन पूजन चहें सोई ॥ २१
एक कमल रख छोड़ा, भक्त ने आँख कमल बनाई।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भये प्रसन्न दिये इच्छित वर ॥ २२
भये प्रसन्न दिये इच्छित वर ॥ २२
कठिन भक्ति देख प्रसन्न हो इच्छित वर दिया।
जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी ॥ २३
करत कृपा सब के घटवासी ॥ २३
अनंत अविनाशी शिव की जय, सभी पर कृपा करते।
दुष्ट सकल नित मोहे सतावै।
भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवै ॥ २४
भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवै ॥ २४
दुष्टजन सताते हैं, चैन नहीं मिलता।
त्राहि-त्राहि मैं नाथ पुकारौ।
यह अवसर मोहे अति उबारौ ॥ २५
यह अवसर मोहे अति उबारौ ॥ २५
हे नाथ रक्षा करो, इस संकट से उबारो।
ले त्रिशूल शत्रुं को मारो।
संकट ते मोहे उबारो ॥ २६
संकट ते मोहे उबारो ॥ २६
त्रिशूल से शत्रु मारो, संकट से उबारो।
मात-पिता ब्रता सब होई।
संकट में पूछत नाहीं कोई ॥ २७
संकट में पूछत नाहीं कोई ॥ २७
माता-पिता भाई संकट में नहीं पूछते।
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ २८
आय हरहु मम संकट भारी ॥ २८
आप ही एक आधार हैं, संकट हर लो।
धन निर्धन को देत सदा ही।
जो कोइ जाचै सो फल पाही ॥ २९
जो कोइ जाचै सो फल पाही ॥ २९
धनहीनों को धन देते, जो माँगता वही पाता।
आस्तु ती केहि विधि करौं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ ३०
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ ३०
कैसे आपकी स्तुति करूँ, दोष क्षमा करो।
शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल करण विघ्न विनाशन ॥ ३१
मंगल करण विघ्न विनाशन ॥ ३१
शंकर संकट नाशक, विघ्न नाशक।
योगी यति मुनि ध्यान लगावै।
शरद नारद शीष नवावै ॥ ३२
शरद नारद शीष नवावै ॥ ३२
योगी ध्यान करते, नारद शीश नवाते।
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पावै ॥ ३३
सुर ब्रह्मादिक पार न पावै ॥ ३३
नमो शिवाय, देव ब्रह्मा भी पार नहीं पाते।
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ३४
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ३४
मन लगाकर पाठ करने वाले को शंभु सहायता करते।
ऋण्यन जो कोइ हो अधकारी।
पाठ करै सो पावन हारी ॥ ३५
पाठ करै सो पावन हारी ॥ ३५
ऋणी व्यक्ति पाठ से पापमुक्त होता।
पुत्र होन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेही होई ॥ ३६
निश्चय शिव प्रसाद तेही होई ॥ ३६
पुत्र इच्छुक को शिव प्रसाद मिलता।
पंडित त्रयोदशी को लावै।
ध्यान पूर्वक होम करावै ॥ ३७
ध्यान पूर्वक होम करावै ॥ ३७
त्रयोदशी को पंडित होम करावें।
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा।
तन नहिं ताके रहै कलेसा ॥ ३८
तन नहिं ताके रहै कलेसा ॥ ३८
त्रयोदशी व्रत से कष्ट न रहें।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावै ॥ ३९
शंकर सम्मुख पाठ सुनावै ॥ ३९
धूप दीप नैवेद्य चढ़ाकर पाठ सुनावें।
जन्म जन्म के पाप नसावै।
अंत धाम शिवपुर में पावै ॥ ४०
अंत धाम शिवपुर में पावै ॥ ४०
जन्म जन्म पाप नष्ट, शिवलोक प्राप्ति।
नित्य नेम करि प्रतहि पाठ करौ चालीस।
तुम मेरी मन कामना पूर्ण करहु जगदीश॥
तुम मेरी मन कामना पूर्ण करहु जगदीश॥
नित्य नियम से चालीसा पाठ करता हूँ। हे जगदीश, मेरी मन की कामना पूर्ण करो।