Dakshinamurthy Stotram — अर्थ सहित संपूर्ण पाठ
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Dakshinamurthy Stotram एक भक्ति स्तोत्र है जो भगवान शिव को समर्पित है और इसका मुख्य उद्देश्य ज्ञान और आत्मबोध की प्राप्ति है। यह स्तोत्र भक्तों को आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा देता है।
- Hymn
- Dakshinamurthy Stotram
- Deity
- Lord Shiva
- Number of verses
- 10
- Best day to chant
- Monday
- Available languages
- English, Telugu, Hindi, Tamil
- Last updated
- 18 Jul 2026
Play along to learn the correct pronunciation and rhythm.
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Dakshinamurthy Stotram के संपूर्ण बोल
Verse 1 Listen
विश्वं दर्पण-दृश्यमान-नगरी तुल्यं निजांतर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यस्साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमे वाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 2 Listen
बीजस्यांतरि-वांकुरो जगदितं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पित देशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृंभयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 3 Listen
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यस्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवांभोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 4 Listen
नानाच्छिद्र घटोदर स्थित महादीप प्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण द्वारा बहिः स्पंदते ।
जानामीति तमेव भांतमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 5 Listen
देहं प्राणमपींद्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्री बालांध जडोपमास्त्वहमिति भ्रांताभृशं वादिनः ।
मायाशक्ति विलासकल्पित महाव्यामोह संहारिणे
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 6 Listen
राहुग्रस्त दिवाकरेंदु सदृशो माया समाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोप संहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 7 Listen
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्ता स्वनु वर्तमान महमित्यंतः स्फुरंतं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 8 Listen
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबंधतः
शिष्यचार्यतया तथैव पितृ पुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो माया परिभ्रामितः
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 9 Listen
भूरंभांस्यनलोऽनिलोंबर महर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।
नान्यत्किंचन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये
Verse 10 Listen
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्व श्रवणात्तदर्थ मननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् ।
सर्वात्मत्व महाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्य-मव्याहतम्
📖 Dakshinamurthy Stotram के बारे में
Dakshinamurthy Stotram का अर्थ क्या है?
Dakshinamurthy Stotram का उच्चारण करने से भक्तों को आत्मज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से शिक्षक और छात्रों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करता है। भगवान दक्षिणामूर्ति को गुरु का रूप माना जाता है, और इस स्तोत्र के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया जाता है। यह भक्तों को ध्यान और साधना में एकाग्रता प्रदान करता है।
Dakshinamurthy Stotram की रचना किसने की और यह कहाँ से आई है?
Dakshinamurthy Stotram का रचना आचार्य आदि शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में है और इसे दक्षिणामूर्ति, जो भगवान शिव का एक रूप है, को समर्पित किया गया है।
Dakshinamurthy Stotram का जाप कब और कैसे करें?
Dakshinamurthy Stotram का उच्चारण गुरुवार के दिन प्रातःकाल में करना शुभ माना जाता है। इसे कम से कम 11 बार दोहराना चाहिए। इसे शांत वातावरण में, ध्यान मुद्रा में बैठकर, स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ना चाहिए।
❤️ Dakshinamurthy Stotram के जाप से क्या लाभ होते हैं?
- ✓ आत्मज्ञान की प्राप्ति
- ✓ विवेक और बुद्धि का विकास
- ✓ आध्यात्मिक प्रगति
- ✓ गुरु-शिष्य संबंध की मजबूती
- ✓ ध्यान में एकाग्रता
- ✓ अनुभवजन्य ज्ञान की प्राप्ति